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15/01/2026

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खामेनेई की सत्ता क्यों नहीं गिरती क्या है इसका राज l Why Iran Protests Fail Again and Again | Who Really Controls Iran?

खामनेई की सत्ता न गिरने का क्या है राज ईरान की सत्ता किसके हाथ में है 

खामेनेई की सत्ता क्यों नहीं गिरती क्या है इसका राज

खामेनेई की सत्ता क्यों नहीं गिरती क्या है इसका राज l Why Iran Protests Fail Again and Again | Who Really C

 

ईरान में लोग मर रहे है carrency टूट चुकी है। देश का लगभग दिवालिया निकल चुका है। फिर भी एक आदमी है जिसकी कुर्सी 37 साल से हिली नहीं है

सवाल ये नहीं कि ईरान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? सवाल ये है कि खामनेई कि सत्ता अब तक क्यों नहीं गिरी 28 दिसंबर को ईरान की राष्ट्रीय मुद्रा इतनी तेजी से गिरी के लोगों को यकीन ही नहीं हुआ और उसी दिन सड़कों पर आग लगनी शुरू हो गई

शुरुआत महंगाई से हुई, लेकिन कुछ ही दिनों में नारे बदल गए अब मांग होने लगी सत्ता परिवर्तन की बिल्कुल वैसे ही जैसा 1979 में हुआ था लेकिन इतिहास गवाह है साहब हर आंदोलन से क्रांति नहीं होती

तो क्या इस बार ईरान में सत्ता बदलेगी या खामनेई फिर से बच निकलेंगे ईरान में भारतीय लोगों के अरेस्ट होने की क्या है हकीकत

जानेंगे आज

28 दिसंबर को ईरान के बाजार खुले थे लेकिन एक चीज़ सामान्य थी वो थी इरानी करेंसी। यानी खाने की कीमतें इतनी बढ़ चुकी थी के मांस और खाना पकाने का तेल कई परिवारों की पहुँच से बाहर हो चुका था। आज ये समस्या आबादी के 57% हिस्से को प्रभावित भी कर रहा है

ऐसा पहले भी हुआ था, लेकिन इस बार गिरावट अलग थी। इतनी तेज की डॉलर 14,20,000 रियाल पार कर गया और यहीं से गुस्सा फूट पड़ा। कुछ ही घंटों में तेहरान के बाजार बंद होते चले गए करीब दो हफ्तों में यह आग विश्वविद्यालय से निकलकर करीब और दूर दराज इलाके यानी गांव तक भी पहुँच गई

यह पहली बार नहीं था 2009 से 2022 तक हर कुछ सालों में ईरान सड़कों पर उतरा है और हर बार सेना ने कुचल दिया लेकिन इस बार कहानी पहले की तुलना में बहुत अलग है इस बार प्रोटेस्ट तब स्टार्ट हुए जब हर तरफ से ईरान अकेला पड़ रहा है

इनके सबसे अच्छे पार्टनर रहे सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद को विद्रोहियों ने सत्ता से हटा दिया। फिर 2025 तक इस्राइल के हमलों ने ईरान समर्थित अब्दुल्लाह और हमास की क्षेत्रीय ताकत को काफी हद तक कमजोर किया है, जिसका नतीजा हुआ कि कभी पश्चिम विरोधी ताकतों के एक मजबूत नेटवर्क की दूरी रहे। ईरान की क्षेत्रीय ताकत पिछले दो वर्षों में लगभग खत्म सी हो गई है

इकॉनमी डाउन होने लगी, महंगाई आसमान छू रही थी, आमदनी घट चुकी थी। महंगाई एक दशक से 40% के ऊपर हो गई। लोगों के पास खोने को अब कुछ बचा नहीं था ठीक ऐसे ही हालात 1979 में भी हुए थे तब भी आग बाजार से ही उठी थी। तब तो सोशल मीडिया भी नहीं था। फिर भी ईरान के शासक रजा शाह पहलवी कंट्रोल नहीं कर पाए और उन्हें निर्वासित होना पड़ा

 

अब बस फर्क इतना था। इस बार हर हाथ में कैमरा था जो दुकानदार कल तक सामान बेचते थे, आज वही बाजार में प्रोटेस्ट की तस्वीरें डाल रहे थे जल्द ही विरोध और उग्र मांगों में बदल गया। प्रदर्शनकारियों के नारे गूंजने लगे। तानाशाह मुर्दाबाद, खामनेई मुर्दाबाद कुछ नारों में 1979 में निर्वासित तो शाही परिवार पहलवी वंश की वापसी की मांग भी सुनाई देने लगी

इसके बाद तो सरकार ने इन का दमन करना शुरू कर दिया। पहले इंटरनेट सेवाएं बंद की, फिर लाठी, पेपर स्प्रे और पत्थरों का इस्तेमाल शुरू हुआ। इसी दौरान सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई का एक बयान आता है कि दंगाइयों को उनकी जगह दिखानी होगी। उसके बाद विरोध और हिंसक हो गया। पुलिस ने एक व्यक्ति को जमीन पर गिराकर पीटा जब आप में कुछ प्रदर्शनकारियों ने प्रोजेक्टाइल फेंके, एक अधिकारी पर पेट्रोल डालकर आग तक लगा दी गई। हालात इतने बिगड़ चूके थे कि कंट्रोल करना ही मुश्किल होगी

लेकिन सवाल ये था क्या ये गुस्सा अपने आप सत्ता गिरा देगा या फिर कोई और भी था जो इस आग का इंतजार कर रहा था रिज़ल्ट साहब ईरान में कई ग्रुप्स है जोखामनेई कि ईरान में मौलवी नेतृत्व को गिराने की कोशिश करते हैं। लेकिन। सफल नहीं हो पाए थे इनमें पहला है मुजाहिदीन जैसे एम के या फिर अलग के नाम से भी जाना जाता है। इसकी शुरुआत 1960 के दशक में एक इस्लामवादी मार्क्सवादी छात्र मलेशिया के रूप में हुई थी जिसने 1979 की इरानी क्रांति में शाह को सत्ता से हटाने में इम्पोर्टेन्ट रोल प्ले किया था और निर्वासित अयातुल्लाह रोहिल्ला खोमैनी की वापसी का रास्ता तैयार किया था

लेकिन सत्ता में आते ही खोमैनी ने एम के को अपने मौलवी नियंत्रित इस्लामी गणराज्य की योजना के लिए बड़ा खतरा माना। फिर उन्हें अपने सुरक्षा एजेंसियों, अदालतों और मीडिया का इस्तेमाल कर पूरी तरह से इन्हें कुचल दिय। जो बच गए वो देश छोड़कर भाग गए। इसके बाद के ने नेताओं की 1979 से 1989 तक 10 साल सुप्रीम लीडर रहे। फिर अयातुल्ला अली खामेनी सुप्रीम लीडर बने लेकिन एमके ने हमला जारी रखा लगभग दो दशकों तक अपने नेता मसूद रजवी के नेतृत्व में

इसमें इरानी नागरिक को और सैन्य ठिकानों पर हमले किए ईरान में इतना हमला करने के बाद भी इसके पास ईरान में समर्थन था लेकिन खामनेई विरोध इतना हावी हो गया। कि रणनीति गलतियाँ कर दी। जब ईरान इराक युद्ध में इसने सद्दाम हुसैन का साथ दिया तभी ईरान के भीतर इसका समर्थन लगभग खत्म। हो गया था। दूसरा बड़ा प्रयास था ग्रीन मूवमेंट 2009 के विवादित चुनाव के बाद मीर हुसैन मुसावी के नेतृत्व में लेकिन 2010 तक इसे पूरी तरह कुचल दिया गया। इन दोनों के अलावा एक तीसरा ग्रुप भी है जो आज भी ऐक्टिव है और अभी जो इरान में हो रहा है उसके पीछे इस ग्रुप का हाथ बताया जा रहा है।

यानी राजशाही समर्थक होगा इसकी अगुवाई आखरी शाह के बेटे रजा पहलवी कर रहे हैं। उन्होंने संवैधानिक राजशाही और पश्चिम के साथ बेहतर संबंधों की बात की 37 साल से सत्ता चला रहे हैं खामनेई का ईरान आज आर्थिक संकट, भारी महंगाई, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, बेरोजगारी, मुद्रा गिरावट और लगातार जन आंदोलनों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। इसलिए एक बार फिर से राजशाही की मांग उठी है। युवाओं को लगता है की पहली की वापसी से ईरान को आर्थिक स्थिरता, वैश्विक एक्सेप्ट एबिलिटी और व्यक्तिगत आजादी मिल सकती है

इस मांग के आने के बाद तो 65 साल के रजा पहलवी देश लौटने की तैयारी भी कर रहे हैं। वो करीब 50 साल से में निर्वासन में रह रहे हैं। कई बार खामनेई की सत्ता गिराने की कोशिश भी हुई, लेकिन असफल रहा। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण वहाँ की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स है। जो सीधे खामिनी को लॉयल्टी देता है, देश को नहीं प्रोटेस्ट कंट्रोल रेस्ट इंटरनेट शटडाउन सब आईआरजीसी के हाथ में ही है, सेना के हाथ में नहीं है। दूसरा इनकी धार्मिक वैधता काम नहीं, सिर्फ रूलर नहीं है साहब। वो सुप्रीम रिलिजस अथॉरिटी भी है। इसलिए प्रोटेस्टर्स को दंगाई विदेशी एजेंट इस्लाम विरोधी कहा जाता है।

जिसके कारण कोई प्रोटेस्ट नेशनवाइड यूनिफाइड मूवमेंट नहीं बन पाता, लेकिन इस बार कुछ अलग हो रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि हालात पहले से कहीं ज्यादा गंभीर है क्योंकि अब यह आंदोलन सिर्फ ईरान में नहीं हो रहा है। ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक जहाँ भी इरानी नागरिक है सब जगह सुप्रीम लीडर के खिलाफ़ आंदोलन हो रहे हैं। ब्रिटेन में तो एक प्रदर्शनकारी ने ईरान दूतावास पर इस्लामी गणराज्य का झंडा हटाकर 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले इस्तेमाल होने वाला झंडा फहरा दिया। इसी दौरान खबर आती है कि अमेरिकी अधिकारियों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान पर संभावित सैन्य हमलों के विकल्पों की ब्रीफिंग दी है।

और ये इसलिए भी ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है क्योंकि सत्ता को डर सिर्फ सड़कों से नहीं है। इतिहास से भी 1979 में जब सत्ता परिवर्तन हुआ था तब ईरान ने विदेश नीती को पूरी तरह बदल दिया और फिर इसी साल 4 नवंबर को इरानी छात्रों ने तेहरान में यूनाइटेड एम्बैसी इन तेहरान पर हमला कर दिया था। इस दौरान उन्होंने 52 अमेरिकी डिप्लोमैट्स और नागरिको को बंधक बनाया

1981 में बंधकों को 444 दिन बाद रिहा किया गया था। और यहीं से अमेरिका, ईरान दुश्मनी शुरू होती है जो आज तक चली आ रही है, ईरान में भारतीय नागरिको की गिरफ्तारी की सच्चाई क्या है

लेकिन साहब ईरान में चल रहे प्रदर्शन के बीच सोशल मीडिया पर एक खबर भी चल रही थी कि ईरान में भारतीय रहवासियों को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन अब भारत में ईरान के राजदूत मोहम्मद फतह अली ने साफ कहा है। ये सोशल मीडिया पर चल रही है जानकारी पूरी तरह गलत है क्या इस बार ईरान में सत्ता बदलेगी या खामनेई फिर से बच निकलेंगे आप क्या सोचते हैं कॉमेन्ट पर अपनी राय लिखे

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